Blog
Story
|
|
आखिऱी सच
मैं तुम्हें समझ नहीं रही या खुद को...
“तुम ईश्वर, खुदा या गॉड नहीं हो सकते समीर और ना ऐसा बनने या जताने की कोशिश करना...”, शुभा ने पुरी तल्ख़ी से ये शब्द कहे थे, जो समीर को देर तक बिंधते रहे. उसने ऐसा कहा क्यों ? आखिऱ इतने दिनों से साथ हैं. तो उसने उसे कितना समझा, कैसे परखा कि...
समीर उसके चेहरे को एकटक देखता रहा, उसने कब चाहा है भगवान बनना ? बल्कि अच्छा साथी, एक अच्छा आदमी बन सके और बना रहे जिंदगी भर इसकी भरपूर कोशिश की है... और ऐसा कह भी क्या दिया! शादी की बात की है, स्वाभाविक है कि पाँच सालों के इस रिश्ते को अब मुक्कमल किया जाय...
समीर जानना चाहता है कि शुभा ने ऐसा कहा क्यों, क्यों वह हमेशा ऐसी बातें किया करती है ? लेकिन वह इस क्यों का ज़बाव शुभा से नहीं पूछ सकता. वह ऐसे मूड में हो तब तो ऐसे किसी ‘क्यों’ के ज़बाव की उससे उम्मीद भी नहीं होती...
“शुभा अब मैंने ऐसा भी क्या कहा जो तुम यो कटखनियाँ सुना रही हो...यार कम से कम इस शाम का मजा तो न खराब करो”, समीर से अपनी झुँझलाहट आखिर जज़्ब न हुई तो जाहिर कर दी.
“मज़ा...हाँ साले मर्दों को मज़ा ही तो चाहिये, हुजूर की खिदमत में कनीज़ हाजिर है...कर लिजिये मज़ा...मजा करने का बर्थराईट लेकर आये हैं साहब...” वह दंश देती मुस्कान के साथ बोली.
दोनों अब जेब्रा क्रॉसिंग पार कर सड़क के दूसरी तरफ आ गए थे. फुटपाथ फुटकर माल बेचने वालों से भरा पड़ा था. कदम रखने की किल्लत थी...हाकरों की चीखें...बाज़ार कहाँ तक फैल आया है... “सौ रूपये जोड़ा...!” बरमूड़ा और बनियान बेचने वाला चिल्ला रहा था. सामने से गुजरते टाउन बस सर्विस की बस के हॉर्न का शोर खत्म हुआ तो समीर ने मुड़कर देखा, शुभा सजी हुई दूकानों पर उड़ती हुई नज़र डाले चल रही थी.
वह अब किराए के उस मकान वाली गली में पहुँच गए थे, जो फिलहाल शुभा का बसेरा था. “शुभा, तुम जानती हो मैं औरत और मर्द को दो नहीं मानता. मेरी नज़र में अगर दोनों का अलग अलग अस्तीत्व है तो दोनों अधुरे हैं. दोनों बल्कि एक दूजे के पूरक हैं, दे कॉम्पलीमेंट इच अदर...मैं तुमसे हर बात में इत्तेफाक रखता हूँ, मगर तुम इस तरह दोनों को लड़ाकू की शक्ल में मत रखो...”
फिर शुभा को कुछ कहने का मौका दिए बगैर ही कहना जारी रखा, दरवाजे के ताले में चाबी लगा कर घुमाई थी, “आई मीन, मैं तुम्हें वो दे सकता हूँ जो तुम्हारे पास नहीं है और तुम मुझे वो जो मेरे पास नहीं है...प्लीज़ होमोसैक्सुअलिटी का प्वाईंट मत उठाना, वो दूसरी बात है...”
“तो तुम्हारा मतलब औरत मर्द सिर्फ जिस्मानी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए हैं...यही है तुम्हारा बायोलॉजिकल एक्सप्लेनेशन...?”
“नहीं सैक्स के अलावा भी दोनों बहुत कुछ शेयर करते हैं, ऐसा नहीं होता तो हमारा ये रिश्ता नहीं होता, आदम और ईव के औलाद दुनिया को इतना आगे नहीं बढ़ा पाते...” समीर ने शुभा के दाखिल होने के बाद दरवाजा बंद किया और कमरे की बत्ती जलाई...
शुभा की निगाह सबसे पहले टेबल पर रखे टाईमपीस की सुईंयों पर गई, साढ़े छ...
बरसात के दिनों की शाम भी कब चुपके से रात में तब्दील हो जाती है...पता ही नहीं लगता. पौने सात, सात पर शंकर आयेगा.
शुभा कंधे का बैग फोल्डिंग चारपाई पर फेंकते हुए बैठ गई थी, “समीर तुम्हें मर्द होकर बहस करने में रूचि नहीं है...यार आज तो लगभग हर मर्द का पौरूषार्थ जैसे इसी मुद्दे पर बोलने से साबित होता है. थोड़ा फुसलाओ तो इंटेलेक्चुअलिटी के एवरेस्ट की पीक पर खुद को पहुँचा हुआ मानने लगता है, नहीं ?” वह बहुत देर के बाद हंसी थी, खुल के हंस रही थी.
“मगर मैं औरत को सिर्फ बहस का मुद्दा नहीं मानता...”
तभी समीर का सेलफोन मीठी धुन बजाने लगा...
“हाँ शंकर”. एलसीडी पर नाम देखकर समीर बोला.
...
“हाँ, बैठी है”.
...
“आ रहा है न ? ठीक...” मोबाईल जेब में वापस रख वह शुभा के बगल में जाकर बैठ गया, “ आ रहा है पन्द्रह मिनट में”.
‘पता नहीं इस लड़की का क्या होगा...’, समीर उसके चेहरे को कनखियों से देखने लगा, एक मक्खी उड़कर उसके भौंह से उपर बैठ रही थी, ‘इसे फेमिनिज्म के दौरे पड़ने कब छूटेंगे...’
“समीर...!” शुभा की बेहद नर्म पुकार से समीर लगभग चिंहुक पड़ा, “आई लव यू समीर...मेरी बातों का बुरा तो नहीं मान जाते ना तुम ? तुम जानते हो ना मैं ऐसी ही हूँ. मगर जैसी भी हूँ, तुम्हारी हूँ...”
“तो नारी मुक्ति मोर्चा का बेताल पीठ से उतर गया तुम्हारे ?” समीर हंसा. शुभा ने भी ओठों के कोर खिंच दिए. समीर पास आकर बैठ गया और कुछ पल उसे निर्निमेष देखकर फिर उसके माथे को चूम लिया. “औरत-मर्द के बीच प्यार का इंसानी रिश्ता ही एक और आखिरी सच है...दुनिया एक औरत या एक मर्द से ना तो पैदा हो सकती थी, ना चल सकती है...समझी”. शुभा के गालों को थपथपा कर वह उठा, “अच्छा मैं चाय बना लेता हूँ, शंकर पहुँचता होगा”.
शंकर पहुँच गया था. साथ में लाए पैकेट को खोलकर कई किताबें मेज पर रख चुका था. निर्मला पुतुल का नगाड़े की तरह बजते शब्द, क्षमा कौल का दर्दपुर, मनीषा की हम सभ्य औरतें, मैत्रेयी पुष्पा की खुली खिड़कियाँ, दिव्या जैन की हव्वा की बेटी, प्रभा खेतान की उपनिवेश में स्त्री, औरत के हक में और तस्लीमा की नष्ट लड़की : नष्ट गद्य जैसी धुँआधार नारीवादी साहित्य के साथ कुछेक पत्रों के स्त्री विषयक लेखों की करतरनों की फाईल भी.
“वाह भाई, तू तो वाकई काम की चीजें ले आया है”, समीर एक प्रति उठाकर कवर देखता हुआ शुभा से बोला, “क्यों शुभा ?”.
“तेरे रिसर्च के लिए इतना अभी काफी है न शुभा...”, शंकर ने ज़ेब से पूर्जा निकाला और देखकर वापस रखते हुए कहा, “बाकि की किताबें दो-एक सप्ताह में मिल जायेंगी”.
“थैंक्स शंकर”, शुभा ने कृतज्ञता से ज़ाहिर की.
शुभा समाजशास्त्र में एम.ए. करने के बाद फिल्हाल राँची युनिवर्सिटी से ‘समकालीन स्त्री का समाजशास्त्रीय अध्ययन’ जैसे किसी विषय पर शोधरत थी. इसी सिलसिले में वह पिछले दो-तीन सालों में कई नारीवादी संगठनों, एन.जी.ओज्., ज़मीनी कार्यकर्ताओं, नितिनिर्धारकों और महिला विचारकों आदि से संपर्क कर चुकी थी. क्या उसके भीतर की औरत के इस तरह एंटी मेल माइंडेड (मर्द विरोधी;), उग्र प्रतिशोधी.... हो जाने के पीछे इसी साहचर्य से उपजे मनोविज्ञान का परीणाम था? हाँ, उसके तर्क अकाटय यथार्थ थे, पर वह खुद भी महसुस कर रही थी कि वह अतिवादिता की शिकार हो जाती थी कभी-कभी. क्या सिर्फ विरोध करने के लिए विरोध करने की प्रवृति ने अनजाने में ही उसे भी चपेट में ले लियी है...क्या वह अपने और समीर के दरम्यान एक स्वस्थ और समान संबंध की संभावनाओं पर कभी-कभी संशक नहीं हो जाती, क्या ये सही है...वह दोनों जिस साझे ख्वाब को पालते हैं, क्या उसे पुरा करने में, वह उसे हकीकत में गढ़ने में समीर का साथ देने की जगह उसे कमजोर कर रही है...उफ् !
समीर कमरे के दूसरे कोने यानि रसोई में स्टोव पर खौलती पतीली में चाय की पत्तियाँ डाल रहा था, आदत के मुताबिक ज्यादा दाने गिरा देने से परेशान होकर जीभ दाँतों में दबाकर मुँह बना रहा था. शुभा की आँखों में स्नेह के जुगनूँ झिलमिला उठे...
“समीर...!”
वह पीछे घूमा, शुभा करीब थी.
शंकर जा चुका था और अब एक खामोशी सी थी या फिर दोनों के साथ होने का एक मांसल एहसास...
“तुम्हारी किताबें तो आ गईं, बेकार परेशान हो रही थी. शंकर एक नम्बर का आदमी है !” समीर ऐसे बोल रहा था जैसे कुछ भी बोलने के लिए बोलना है. शुभा ने हाथ बढ़ाया और समीर ने महसूसते हुए देखा अपनी कलाई पर वह नर्म दबाव...शुभा ने उसका हाथ अपनी हथेली में भर लिया...उसका माथा समीर के सीने से लग गया और साँसें उसकी कमीज़ के फाँकों से होती हुई उसकी छाती को छूने लगीं.
“शुभा, तू कोर्ट मैरिज़ को प्रिफरेंस देती है ना, मैं कल ही अर्जी डाल दूँगा. शंकर और दो गवाहों का बंदोबस्त कर देगा, एक तो वह खुद रहेगा. तू कल थोड़ा जल्दी उधर से निबटकर रजिस्ट्रार के दफ्तर चली आना. देख, तू जैसा चाहती है वही होगा... आई लव यू गुड़िया. तेरी खुशी जिसमें है, बस वही मेरी मर्जी है. तू ऐसे रूखाई से बात मत किया कर, जिगर कटता है मेरा...” शुभा का सिर उठा. आँखें ठीक आँखों पर ठहरीं, “तुम मुझे पागल तो नहीं समझते न समीर ?” बेहद निज सी आवाज़.
शुभा को लगा, आखिर उसे ही क्या हो जाता है... क्या वह खुद अपने आप को ही नहीं समझ रही... शाम से जो कुछ भी उसका बर्ताव था, वह क्या था ? उस समीर के साथ, जो इस शहर में ही नहीं, उसकी तमाम जिंदगी का साथी रहने वाला है. उस बरगद की तरह, जिसकी छाँव में वह ना सिर्फ़ सुस्ता सकती है, जब जी चाहे उसकी शाखों से लिपट दिल का हाल कह सकती है... रो सकती है... झूल सकती है... सुकून पा सकती है...
ना चाहते हुए भी फिर अपनी वही बातें उसके जेहन में उतरने लगीं...
“तुम कहते हो कि तुम मुझसे प्यार करते हो...मर्द प्यार करता है या ऐश करता है ! तुम शादी की बात करते हो, तुम्हारे लोग चाहते हैं कि अरेंज्ड मैरिज़ हो, और तुम, तुम भी...? तुमसे जो साल भर से कह रही हूँ कि मजिस्ट्रेट के पास एप्लीकेशन सबमिट कर दो मगर नहीं, तुम कोर्टमैरिज़ नहीं करोगे ना...संस्कार और संस्कृति की दुहाई मत देना प्लीज़...तुम...तुम...सच बोलूँ, तुम दरअसल अपने घरवालों के पिठ्टू हो...मामास् गुड बॉय !” समीर को बोलने का कोई मौका दिए बिना वह कहे जा रही थी, समीर खुद भी जानता था कि वह ऐसा ही करती है...जब बोलती है तो न माहौल का ख्याल करती है, ना वक्त की परवाह... “सात फेरे...सात वचन, माईफुट ! मर्द वायदे करता है, औरत पट्टा लिखवाती है...मर्द उसे केयरटेकर बनाता है और औरत उसे अपना ओनर... आप मेरे पति, मेरे स्वामी, मेरे भगवान, मेरे विधाता, मेरे ठेकेदार...बताऊँ तुम्हें सात फेरों की हकीकत ?...” शुभा जब ऐसे बोलने लगती थी तो उसका चेहरा दहकने लगता था, समीर ने कई बार वह आँच महसुस की है...वह समझता है कि शुभा की बातों के तर्क को हमारी सिविल सोसाईटी का इतिहास साबित करता है, शुभा चाट का प्लेट पकड़े और दूसरे हाथ से चेहरे पर आ रही लटों को हटाते हुए अब भी धीरे-धीरे बड़बड़ा रही थी, “तव भक्ति सा वदेद् वच्छच्छ , मेरे देवता आपकी पूजा करूँगी... अर्ते अर्व सपदे वदेत्, मेरे स्वामी आपकी सभी इच्छाओं का पालन करना है मुझे...”
शुभा की धीमी आवाज़ भी तल्ख़ से तल्ख़तर होती गई....
“आखिर फिर वही बात ना... शुभा आखिर तुम मुझसे तो ऐसा मत कहो...मैंने कब तुम्हें...”
“नहीं कहा तो कहोगे, कल कहोगे ही... भी डरते हो कि हाथ से निकल जायेगी, लेकिन कल जब गाँठ बाँध के ले जाओगे तो समझोगे बपौती हुई...फिर क्या नहीं कहोगे या करोगे...मर्द प्यार करता हो और बाईचांस शादी भी करता है और औरत प्यार करके शादी करती है तो बात एक नहीं रहती...मायने बहुत बदल जाते हैं...समझे, यही सच है”. उसने प्लेट छोड़ दी और समीर को घूरा. समीर ने भी प्लेट आधी छोड़ दी और चाटवाले को पैसे चुका कर बगैर नज़र मिलाए बोला, “चलो...” और फुटपाथ पर बढ़ गया... कुछ देर बाद उसने बिना मुड़े आहिस्ता से कहा था, “मैं तुमसे प्यार करता हूँ”.
“समीर तुम मानो ना मानो, मर्द वैसे प्यार नहीं कर सकता जैसा औरत करती है...”
“जान मेरी, तुम एक मिनट के वास्ते हमारे बीच ये औरत-मर्द का गणित हटाओगी प्लीज़...” समीर ठहरकर मुड़ा.
“तुम इल्जाम सुन नहीं सकते तो सफाई देने का हक़ खो दोगे समीर...प्यार में औरत के पास देने या खोने के लिए मर्द से कहीं ज्यादा होता है...वह मन के साथ बदन को भी देने से गुज़र जाती है और मर्द के पास दाँव पर लगाने के लिए वैसा कुछ भी नहीं होता...” शुभा अपनी रौ में कहती गई थी...
शुभा का मूड कसैला हो जाने के चरम पर आ जाता, अगर समीर की सरगोशी जैसी आवाज नहीं आती... “फिर उल्टी बात...मैंने कभी ऐसा जताया भी है ?” समीर उसके और पास आ खड़ा हुआ था.
“नहीं समीर, तुम अच्छे हो, बहुत अच्छे. मगर सब तुम्हारी तरह नहीं हो सकते. फिर क्या पता कल तुम भी बदल जाओ तो...”
“तुम अपॉजिट सैक्स पर अपना विश्वास खो चुकी हो”, समीर की आवाज़ में भारीपन आ गया, “मगर ऐसे कैसे काम चलेगा...तू यकीन कर, मैं तेरे किसी मौलिक या लैंगिक अधिकार का अतिक्रमण नहीं करूँगा. और ये कोई बड़ी बात भी नहीं है...परस्पर सम्मान के बगैर कोई रिश्ता बना और टिका रह ही नहीं सकता... “
समीर ने केतली की बची चाय को दोनों कपों में बराबर डालकर एक शुभा की ओर बढ़ाया और कोने वाली टेबल पर जा कर बैठ गया. कल आई डाक के ज़बाव उसे तैयार करने थे और इस शहर में उसे अपने घर से ज्यादा सुविधाजनक जगह शुभा की ये ४ बटा ६ की किराये की कोठरी लगती थी, शांतिपूर्ण...सीलन की बदबू को दबा कर यहाँ शुभा के साहचर्य की खुशबू ही बहा करती थी...
शुभा किताबें समेटकर दीवार पर बने आले में सरियाती हुई बराबर उसकी तरफ देखती रही. औरत बादल है, बरसना चाहती है. नरम, ठंड़ी, पुरसुकून देती बौछार की तरह...मर्द धूप की तरह गुनगुना और रुखा... उसे किसी लेख का निष्कर्ष-वाक्य याद आया. उसके भीतर कुछ भीना-भीना सा महक गया. ‘लेकिन अगर उस लेखिका ने मुझे और समीर को कभी देखा होता तो अपने राईटअप में ऐसा कतई ऑबटेंड नहीं करतीं !’ उसके जेहन में आया था...
“स्त्री के दिल की बात वही जाने या उसे बनाने वाला...”, शंकर ने अपने हिसाब से बात मज़ाक में कही थी और खुद ठहाके लगाने के लिए तैयार हो रहा था कि शुभा ने तड़ से जबाव दिया, “तो ?... मर्द औरत को कितना समझता है ?...फिर भी उस पर, उसके बारे में लिख और गला फाड़कर, औरत को सब्जेक्ट बनाकर उसका ऑथोरिटी होने का क्रेडिट नहीं ले रहा ? शंकर, येस इटस् ए फेक्ट...मर्द कभी हमें थॉरोली समझ ही नहीं सकता, फिजूल की बहसें करता है, स्त्री-विमर्श का स्टंट करता है”.
“शुभा, तुम भी यार ! राई का पहाड़ बना देती हो”, समीर ने टोकने वाले अंदाज़ में कहा.
“तो सच नहीं कह रही क्या ? औरत की बात सुनने का माद्दा ही मर्द में नहीं होता...खुद को ही देखो...”
“तुम औरत-मर्द को दो खानों में बाँटकर क्यों देख रही हो ?”
“इसलिए... इसलिए कि तुम्हारे श्रद्घेय पुरखों ने दोनों को एक इकाई होने कहाँ दिया है ? तुम्हारे बाबूजी को रात-दोपहर अपनी मर्दानगी पर डाउट होने पर अपनी प्रेगनेंट बीबी को लाठी से पीटने को मज़बुर होना पड़ जाता था ! ले स्साली,
Categories: None
Post a Comment
Oops!
The words you entered did not match the given text. Please try again.
Oops!
Oops, you forgot something.